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  • av Rashmeen Majahar Mulla
    687,-

    This book is for those whose mother tongue or native language are different from English. In this book I have tried to do just that is to improve your English speaking skills. After reading this book you will feel much more confidents and better equipped at speaking better English. The book contains 100 days and each day is given in a detailed manner so that you get the full knowledge about the given topic. Book also contains vocabulary, idioms, grammar parts, fiction and nonfiction stories, informational essays and many more related to english speaking skills. They may help you in practicing correct and fluent English. Practicing is the first step for fluency. So follow properly and keep practicing and keep growing..

  • av Paraveen Kumar Anshuman
    395,-

    The Famished Gods: Speaking Selves in Akkarmashi is a critical reception of the Indian Dalit classical autobiography of Sharankumar Limbale, Akkarmashi, The Outcaste (2003). This book microscopically scrutinizes aspects of penury and destitution for which 'stomach' becomes the metaphor. While centrally focusing on the themes of 'food' and 'hunger', it also undertakes discussions on resistance, identities, atrocities and the like. ". . .This book is a must read for anyone who cares for the liberation and empowerment of dalits." - Bama, a Renowned Dalit Novelist "This is a powerful, and at times heart wrenching book. Essential reading for all connected with the emancipation of Dalits. - Robert Maddox-Harle, Writer & Reviewer, Australia "The Famished God' is a successful academic endeavour in analyzing the roots of social, cultural, economic and political dialectics in India through its deliberations on hunger in Akkarmashi. . ." - Ajay Navaria, an Eminent Academician & Scholar

  • av A. Von Rosenberg
    341,-

    NA

  • av Amrendra Narayan
    434

    Unity And Strength is a novel inspired by the life of Sardar Vallabhbhai Patel. The Architect of Independent India. His qualities of ardent patriotism, unflinching courage and determination, sharp foresight and honest hard work have influenced millions of people during and after the freedom struggle. The present generation of Indians looks at his contribution with much awe and respect. Sardar Patel is a great source of strength and an idol of national unity. The novel describes how inspired by his sacrifice and dedication, common families came forward to follow him int he freedom struggle. It also narrates how in the independent India, the great leader unified the princely states in an astonishingly efficient manner within an unbelievable short time. Drawing inspiration from his life and thoughts, the novel indicates what we can do to fully realise his unfulfilled dreams of making a prosperous and strong India.

  • av Shankha Ghosh
    421,-

    हमारी परम्परा में यह माना गया है कि गद्य कवियों का निकष होता है यह निरा संयोग नहीं है कि प्रायः सभी भारतीय भाषाओँ में महत्त्वपूर्ण कवियों ने अच्छा, सरस और रौशनी देने वाला गद्य लिखा है हम इस पुस्तक माला में ऐसा कवि-गद्य प्रस्तुत करने के लिए सचेष्ट हैं शंख घोष न सिर्फ इस समय बांगला के सबसे बड़े कवि हैं, वे भारतीय कवि समाज में भी मूर्धन्य हैं उनका गद्य हम दो खण्डों में प्रस्तुत कर रहे हैं वह उनकी सूक्ष्म जीवन और काव्य-दृष्टी का साक्ष्य है कई विषयों पर नए ताज़े ढंग से सोचने के लिए हमें प्रेरित भी करता है उनके यहाँ बारहा ऐसे अनुभवों को गद्य में रूपायित करने की चेष्टा है जो अक्सर गद्य के अहाते से बाहर रहे आये हैं-अशोक वाजपेयी

  • av Krishna Baldev Vaid
    461,-

    कृष्ण बलदेव वैद की डायरियों की जो पुस्तकें इससे पहले प्रकाशित हुई हैं उन्होंने अपनी बेबाकी, लेखक के निर्मम आत्मालोचन, व्यक्तियों और घटनाओं पर तात्कालिक प्रतिक्रियाओं, अनेक देशी-विदेशी लेखकों और कृतियों के आस्वादन और प्रासंगिक आकलन के लिए याद किया जाता है। उनका अनौपचारिक गद्य, फिर भी, एक बड़े लेखक का गद्य है और ये डायरियाँ अपने समय-समाज-साहित्य आदि को देखने, गुनने का एक लेखकीय उपक्रम। उसके वितान में मित्र, लेखक, कलाकार आदि सब आते हैं और उसमें आपबीती रोचक ढंग से परबीती बनती जान पड़ती है।-अशोक वाजपेयी

  • av Muriel Lester
    395,-

    महात्मा गांधी के अपने विपुल साहित्य और लेखन के अलावा उन पर लिखी गयी सामग्री भी विपुल है। फिर भी उन्हें और नज़दीक से जानने-समझने की इच्छा भी शिथिल नहीं पड़ती। उनके समकालीनों के अनेक संस्मरणों में गांधी जी जब-तब सजीव होते रहते हैं। ऐसी ही एक पुस्तक बीसवीं शताब्दी के चौथे दशक में एक अँग्रेज़ महिला ने प्रकाशित की थी जिन्होंने कुछ समय के लिए गांधी जी की मेज़बानी की थी। उसमें इस अनोखे व्यक्ति की सहज मानवीयता, आत्मविश्वास, अपनी दृष्टि और मूल्यों पर हर हालत में अड़े रहने के प्रसंग सहज प्रवाह में आये हैं। एक ऐसे समय में जब हम पश्चिम के आतंक और अनुकरण में मुदित मन लगे हैं, यह पुस्तक उसे आतंक से सर्वथा मुक्त एक भारतीय आत्मा को एक बार फिर सामने लाती है और उसका हिन्दी अनुवाद प्रकाशित करते हुए हमें प्रसन्नता है।-अशोक वाजपेयी

  • av Geet Chaturvedi
    488,-

    "साहित्य को जीने की शक्ति देनेवाला माननेवाले गीत चतुर्वेदी का गद्य कई विधाओं को समेटता है उसमें साहित्य, संगीत, कविता, कथा आदि पर विचार रखते हुए एक तरह का बौद्धिक वैभव और संवेदनात्मक लालित्य बहुत घने गुँथे हुए प्रकट होते हैं। उनमें पढऩे, सोचने, सुनने-गुनने आदि सभी का सहज पर विकल विन्यास भी बहुत संश्लिष्ट होता है। एक लेखक के रूप में गीत की रुचि और आस्वादन का वितान काफी फैला हुआ है। लेकिन उनमें इस बात का जतन बराबर है कि यह विविधता बिखर न जाय। उसे संयमित करने और फिर भी उसकी स्वाभाविक ऊर्जा को सजल रखने का हुनर उन्हें आता है।" -- अशोक वाजपेयी

  • av Amit Dutta
    395,-

    कलाओं में भारतीय आधुनिकता के एक मूर्धन्य सैयद हैदर रज़ा एक अथक और अनोखे चित्रकार तो थे ही उनकी अन्य कलाओं में भी गहरी दिलचस्पी थी। विशेषत कविता और विचार में। वे हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते थे और हालाँकि उनका फ्रेंच और अँग्रेज़ी का ज्ञान और उन पर अधिकार गहरा था, वे, फ्रांस में साठ वर्ष बिताने के बाद भी, हिन्दी में रमे रहे। यह आकस्मिक नहीं है कि अपने कला-जीवन के उत्तराद्र्ध में उनके सभी चित्रों के शीर्षक हिन्दी में होते थे। वे संसार के श्रेष्ठ चित्रकारों में, 20-21वीं सदियों में, शायद अकेले हैं जिन्होंने अपने सौ से अधिक चित्रों में देवनागरी में संस्कृत, हिन्दी और उर्दू कविता में पंक्तियाँ अंकित कीं। बरसों तक मैं जब उनके साथ कुछ समय पेरिस में बिताने जाता था तो उनके इसरार पर अपने साथ नवप्रकाशित हिन्दी कविता की पुस्तकें ले जाता था उनके पुस्तक-संग्रह में, जो अब दिल्ली स्थित रज़ा अभिलेखागार का एक हिस्सा है, हिन्दी कविता का एक बड़ा संग्रह शामिल था।रज़ा की एक चिन्ता यह भी थी कि हिन्दी में कई विषयों में अच्छी पुस्तकों की कमी है। विशेषत कलाओं और विचार आदि को लेकर। वे चाहते थे कि हमें कुछ पहल करना चाहिये। 2016 में साढ़े चौरानवे वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के बाद रज़ा फाउण्डेशन ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए हिन्दी में कुछ नये किस्म की पुस्तकें प्रकाशित करने की पहल 'रज़ा पुस्तक माला' के रूप में की है।

  • av Mahesh Verma
    395,-

    कलाओं में भारतीय आधुनिकता के एक मूर्धन्य सैयद हैदर रज़ा एक अथक और अनोखे चित्रकार तो थे ही उनकी अन्य कलाओं में भी गहरी दिलचस्पी थी। विशेषत कविता और विचार में। वे हिन्दी को अपनी मातृभाषा मानते थे और हालाँकि उनका फ्रेंच और अँग्रेज़ी का ज्ञान और उन पर अधिकार गहरा था, वे, फ्रांस में साठ वर्ष बिताने के बाद भी, हिन्दी में रमे रहे। यह आकस्मिक नहीं है कि अपने कला-जीवन के उत्तराद्र्ध में उनके सभी चित्रों के शीर्षक हिन्दी में होते थे। वे संसार के श्रेष्ठ चित्रकारों में, २०-२१वीं सदियों में, शायद अकेले हैं जिन्होंने अपने सौ से अधिक चित्रों में देवनागरी में संस्कृत, हिन्दी और उर्दू कविता में पंक्तियाँ अंकित कीं। बरसों तक मैं जब उनके साथ कुछ समय पेरिस में बिताने जाता था तो उनके इसरार पर अपने साथ नवप्रकाशित हिन्दी कविता की पुस्तकें ले जाता था उनके पुस्तक-संग्रह में, जो अब दिल्ली स्थित रज़ा अभिलेखागार का एक हिस्सा है, हिन्दी कविता का एक बड़ा संग्रह शामिल था।रज़ा की एक चिन्ता यह भी थी कि हिन्दी में कई विषयों में अच्छी पुस्तकों की कमी है। विशेषत कलाओं और विचार आदि को लेकर। वे चाहते थे कि हमें कुछ पहल करना चाहिये। २०१६ में साढ़े चौरानवे वर्ष की आयु में उनकी मृत्यु के बाद रज़ा फाउण्डेशन ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए हिन्दी में कुछ नये किस्म की पुस्तकें प्रकाशित करने की पहल रज़ा पुस्तक माला के रूप में की है, जिनमें कुछ अप्राप्य पूर्व प्रकाशित पुस्तकों का पुनर्प्रकाशन भी शामिल है। उनमें गांधी, संस्कृति-चिन्तन, संवाद, भारतीय भाषाओं से विशेषत कला-चिन्तन के हिन्दी अनुवाद, कविता आदि की पुस्तकें शामिल की जा रही हैं। सभी पुस्तकों पर रज़ा साहब और उनके समकालीन मित्र चित्रकारों आदि की प्रतिकृतियाँ आवरणों पर होंगी।'आमुख' से

  • av Namvar Singh
    421,-

    उनका अध्ययन असीम है, स्मृति अथाह और वैचारिक व्याकुलता अविराम। नामवर सिंह के रूप में हिन्दी के पास एक ऐसा व्यक्तित्व है जो सतत् चिन्तनशील है, सतत् सृजनरत है, सदैव मुखर है। आलोचक या लेखक होना उनके लिए सिर्फ एक औपचारिक बाना नहीं है जिसे अवसर देखकर पहना और उतारा जा सके। उनका होना वही होना है जैसा हम उन्हें देखते हैं। जब वे नियमपूर्वक नहीं लिख रहे थे, और ज्यादातर भाषणों और व्याख्यानों में अपनी बात रख रहे थे तब भी उन्होंने बहुत लिखा कभी किसी पुस्तक की भूमिका के रूप में, कभी किसी आयोजन के लिए और कभी स्वतंत्र किसी पत्र-पत्रिका के लिए।इस पुस्तक में उनके ऐसे ही असंकलित और कुछ अप्रकाशित आलेखों को संकलित किया गया है। इनमें से जो आलेख किसी पुस्तक की भूमिका के तौर पर लिखे गए, वे भी सिर्फ पुस्तक की प्रशस्ति नहीं हैं, उनमें समीक्षा-आलोचना के उन्हीं मानदंडों का निर्वाह किया गया है, जो नामवर सिंह के चिन्तन की पहचान हैं। रचना को अनेक कोणों से जानने की कोशिश और उसके उस मूल तत्त्व को रेखांकित करने का प्रयास जो उस रचना या उस लेखक को विशिष्ट बनाता है।इस संकलन में हम भारत और विश्व के कुछ ऐसे रचनाकारों को नामवर जी की निगाह से देखेंगे जो निसन्देह अपरिचित नाम नहीं हैं। उन्हें हमने पढ़ा भी है, समझा भी है लेकिन यहाँ नामवर जी की व्याख्या के साथ उन्हें जानना बेशक एक उपलब्धि है। साथ ही भाषा सम्बन्धी विमर्श और अंग्रेजी में लिखित कुछ व्याख्यानों का अनुवाद भी यहाँ संकलित है जो पाठकों के लिए निश्चित ही संग्रहणीय है।

  • av Ramashankar Kushwaha
    461,-

    प्रभाष जोशी ने हिन्दी पत्रकारिता को नए मुकाम तक पहुँचाया। शब्द और कर्म की एकता के विश्वासी प्रभाष जोशी ने जन-संबद्ध पत्रकारिता के एक नए दौर की शुरुआत की। उनके द्वारा सम्पादित 'जनसत्ता' अपने समय की जन-संवेदना का नायाब दस्तावेज़ है। हिन्दी पत्रकारिता के विकास में ऐतिहासिक भूमिका निभानेवाले प्रभाष जोशी के जीवन की यह कहानी उनके समय की भी कहानी है, क्योंकि उनके लिखने और जीने की एक ही मंजि़ल थी-लोक-संबद्धता। इस लोक-संबद्ध व्यक्तित्व की जीवन-गाथा के अनेक पड़ाव हैं। इस जीवनी में आपको उन पड़ावों का विस्तृत और प्रामाणिक विवरण मिलेगा। प्रभाष जी के व्यक्तिगत जीवन के अनजाने प्रसंगों से आप रू-ब-रू होंगे। उनके सार्वजनिक जीवन के निर्भय सोच के सन्दर्भों से आप अवगत होंगे। हिन्दी के जीवनी साहित्य की परम्परा में प्रभाष जी की यह शोधपरक जीवनी एक नई पहल है। प्रभाष जी की लोक-संबद्ध जीवन-दृष्टि को समझने और उसका विस्तार करने में यह जीवनी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।

  • av Alka Saraogi
    434

  • av Raghuvir Sahay
    421,-

    रघुवीर सहाय अप्रतिम कवि थे। विचार की ठोस और स्पष्ट जमीन पर पैर रखे हुए उन्होंने अपने कवि को एक बड़ा आकाश दिया जिसे आनेवाले समय में एक शैली बन जाना था। यह नवोन्मेष उनकी कहानियों में भी था, इससे कम लोग परिचित हैं। इस संकलन में उपस्थित उनकी समग्र कथा-सम्पदा के पाठ से हम जान सकते हैं कि कविता में जिस वृहत्तर सत्य को अंकित करने का प्रयास वे करते थे, वह किसी फॉर्म को साधने भर का उपक्रम न था, अपने अनुभव और उसकी सम्पूर्ण अभिव्यक्ति की व्याकुलता थी जो उन्हें अन्य विधाओं तक भी ले जाती थी। इस पुस्तक में संकलित उनके कथा-संग्रहों के साथ प्रकाशित दो भूमिकाएँ एक बड़े रचनाकार के बड़े सरोकारों का पता देती हैं, जिनमें एक चिन्ता लेखन के उद्देश्य को लेकर भी है। वे कहते हैं कि मनुष्यों के परस्पर सम्बन्धों को बार-बार जानने और जाँचने की आवश्यकता ही लेखन की सबसे जरूरी वजह है। कुछ तत्त्व हमेशा काम करते रहते हैं जिनके राजनीतिक उद्देश्य समता और न्याय के विरुद्ध होते हैं, वे संगठित होकर लेखक द्वारा बताए सत्य को विकृत कर प्रचारित किया करते हैं। लेखक के लिए बार-बार अपने मत को बताना इस आक्रमण के विरुद्ध आवश्यक होता है। रघुवीर सहाय की कविताएँ अपनी काया का निरन्तर अतिक्रमण करते हुए यही कार्य हमेशा करती रहीं; और ये कहानियाँ भी वही करती हैं।

  • av Kunwar Narain
    421,-

    कुँवर नारायण अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित कवि हैं। वह विश्व-सिनेमा के गहरे जानकारों में हैं। उन्होंने आधी सदी तक सिनेमा पर गम्भीर, विवेचनापूर्ण लेखन किया है, व्याख्यान दिए हैं। 'लेखक का सिनेमा' उन्हीं में से कुछ प्रमुख लेखों, टिप्पणियों, व्याख्यानों और संस्मरणों से बनी पुस्तक है। इसमें अनेक अन्तरराष्ट्रीय फिल्मोत्सवों की विशेष रपटें हैं, जो लेखकीय दृष्टिकोण से लिखी गई हैं और बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। इस किताब में वह कला, जीवन, समाज और सिनेमा, इन सबके बीच के सम्बन्धों को परिभाषित, विश्लेषित करते हुए चलते हैं। एक कवि, दूसरे कला-माध्यम के साथ संवाद करते हुए, अपनी कला के लिए कैसे नए सूत्रों की अर्जना करता है, यह किताब इसका उदाहरण है; इसमें सिनेमा के व्याकरण की आत्मीय मीमांसा है। यहाँ देख डालने, सोच डालने की जल्दबाज़ी नहीं है, बल्कि विचार की एक लम्बी, निरन्तरता से भरी प्रक्रिया है, जो उतनी ही गझिन है, जितनी फिल्म बनाने की प्रक्रिया। प्रसिद्ध फिल्मों व निर्देशकों के अलावा उन निर्देशकों व फिल्मों के बारे में पढ़ना एक धनात्मक अनुभव होगा, जिनका नाम इक्कीसवीं सदी के इस दूसरे दशक तक कम आ पाया। हिन्दी किताबों से जुड़ी नई पीढ़ी, जो विश्व-सिनेमा में दिलचस्पी रखती है, के लिए इस किताब का एक दस्तावेज़ी महत्त्व भी है। अर्जेंटीना के लेखक बोर्हेस की प्रसिद्ध पंक्तियाँ हैं-''मैं वे सारे लेखक हूँ जिन्हें मैंने पढ़ा है, वे सारे लोग हूँ जिनसे मैं मिला हूँ, वे सारी स्त्रियाँ हूँ जिनसे मैंने प्यार किया है, वे सारे शहर हूँ जहाँ मैं रहा हूँ। 'कुँवर नारायण के सन्दर्भ में इसमें यह जोड़ा जा सकता है कि मैं वे सारी फिल्में हूँ जिन्हें मैंने देखा है'।" -गीत चतुर्वेदी.

  • av Ajit Wadnerkar
    488,-

  • av Rajendra Ratnesh
    395,-

    यह उपन्यास श्रावक उमरावमल ढढ्ढा की जीवनी पर आधारित है। श्री ढढ्ढा का जीवन सीधा, सादा और सरल था। रायबहादुर सेठ के पौत्र और एक बड़ी हवेली के मालिक होकर भी उन्होंने आमजन का जीवन जिया। पुरखों के द्वारा छोड़ी गई करोड़ों की सम्पत्ति को अपने भोग-विलास पर खर्च नहीं करके दान कर दी। उनके पुरखे अंग्रेजों के बैंकर थे। उनका व्यवसाय इन्दौर, हैदराबाद तक फैला था। महारानी अहल्याबाई के राखीबंद भाई उनके पुरखे थे। उन्होंने पुरखों की सम्पत्ति को छुए बिना नौकरी करके अपना जीवन-यापन किया। श्री ढढ्ढा वस्तुत एक अकिंचन अमीर थे। वे सचमुच ही निर्लेप नारायण थे। उमरावमल ढढ्ढा मानते थे कि मैं सबसे पहले इंसान हूँ, बाद में हिन्दुस्तानी। उसके बाद जैन। जैन के बाद श्वेतांबर। स्थानकवासी परंपरा का श्रावक। वे सम्यक् अर्थों में महावीर मार्ग के अनुगामी और अनुरागी थे। वे हमेशा अपनी बात अनेकांत की भाषा में कहते थे। अनेकांत को समझाने का उनका फार्मूला बड़ा सीधा था। वे कहते थे कि 'ही' और 'भी' में ही अनेकांत का सिद्धांत छिपा है। मेरा मत 'ही' सच्चा है, यह एकांतवाद है जबकि अनेकांत कहता है कि मेरा मत 'भी' सच्चा है और आपका मत 'भी' सच्चा हो सकता है। उन्होंने पुरखों के छोड़े करोड़ों रुपयों के धन को छुआ ही नहीं। वकालत, वृत्तिका और व्यवसाय-इन सब में उन्हें वांछित सफलता नहीं मिली। वकालत इसलिए छोड़ दी कि झूठ की रोटी वे नहीं खा सकते थे। वृत्तिका भी गिरते स्वास्थ्य की वजह से लंबी नहीं चली। व्यवसाय में घाटे पर घाटे लगे। जो कुछ पास में बचा, वह दान-पुण्य में लुटा दिया। उन्होंने अमीरी को छोड़ गरीबी को अपनाया। जब भी कोई ढढ्ढा हवेली की भव्यता को देखता तो उसकी आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह जातीं कि इतनी बड़ी हवेली का स्वामी एक सीधी-सादी जिंदगी जी रहा है।

  • av Asha Prabhat
    461,-

    भारितीय मानस का अर्थ केवल पढ़े लिखे शिक्षितों का मानस नहीं है. उसका मूल अभिप्राय है - लोक मानस. इस लोक मानस की भारतीयता का लक्षण है - काल के आदिहीन, अंतहीन प्रवाह की भावना.. जनमानस में आज तक सीता का मूक स्वरुप विद्यमान है. सौम्यस्व्रूपा आज्ञाकारी पुत्री का, जो बिना तर्क वितर्क या प्रतिरिओध किये पिता का प्रण पूर्ण करने हेतू या पुत्री धर्मं के निर्वाह हेतू उस किसी भी पुरुष के गले में वरमाला दाल देती है, जो शिव के विशाल पिनक पर प्रत्यंचा का संधान कर देता है. उस समर्पिता, सहधर्मिणी या सह-गामिनी पत्नी का जो सहज्भ्हाव से राज्य सुख तथा वैभव त्यागकर पति राम की अनुगामिनी बनकर उनके संग चल देती है चुनौती भरे वन्य जीवन के दुखों को अपनाने. सीता के चरित पर अनके ग्रन्थ लिखे गए हैं, अधिकांश में उन्हें जगजननी या देवी मानकर पूजनीय बनाया गया है. किन्तु मानवी मानकर उनके मर्म के अन्तःस्तल तक पहुँचने.. उनके मर्म की था लेने की चेष्टा न के बराबर की गयी है. उनके प्रती किये गए राम के सारे निर्णय को उनकी मौन स्वीक्रति मानकर राम की म्हणता, मर्यादा तथा उत्तमता की और महिमामंडित किया गया है. क्या वास्तव में ऐसा था ? क्या सीता के पास अपने प्रति किये जा रहे अविचार के प्रति प्रतिरोध के स्वर का आभाव था ? क्या उनका अंतस संवेदनशून्य था या उन्हें हर्ष-विषद तथा शोक-संताप नहीं व्याप्तता था? और क्या हर स्तिथि - परिस्तिथि को उन्होंने स्वीकार लिया था, शिरोधार्य कर लिया था बिना प्रतिवाद के. यह उपन्यास ऐसे ही अनेक प्रश्नों का संधान है.

  • av Sharad Pawar
    249 - 474,-

  • av Aasteek Vajpeyi
    395,-

    कविता वह समय है जिसे इतिहास देख भले ले पर दुहरा नहीं सकता.. ये कुछ शब्द नए कवि आस्तीक वाजपेयी की कविता के हैं जो तुमुल कोलाहल-कलह के बीच कवि की आवाज़ में बचे रह गए उस समय की याद दिलाते हंै जिसमें पुराण और पुरखों की स्मृति बसी हुई है। इस कविता को पढ़ते हुए उस अग्रज समय का अहसास होता है जो जल्दी नहीं बीतता, स्मृति बनकर साथ-साथ चलता है और थर-थर काँपते वर्तमान में उस कवि-धीरज की तरह स्थिर बना रहता है जिसके सहारे कवि आस्तीक अपने काव्यारम्भ की देहरी पर यह पहचान लेते हैं कि मैं उसी से बना हूँ जो ढह जाता है। आस्तीक की कविता हमें फिर याद दिला रही है कि- जीत नहीं हार बचा लेती है अस्तित्व के छोर पर। यह प्रश्नाकुल कविता है जो हमसे फिर पूछ रही है कि- इस दुनिया के राज़ कौन जानता है और यह दुनिया है किसकी? यह कविता इस प्रश्न से फिर सामना कर रही है कि हमें क्यों इच्छाएँ इतनी अधिक मिलीं और कौशल इतना कम। इस नई कवि-व्यथा में डूबा साधते हुए संसार का सामना इस तरह होता है कि जैसे-बारिश के आँसू सूख चुके हैं, वे धरती को गीला नहीं करते। जैसे-गुस्सा, अहंकार और हठ ताल पर चन्द्रमा की प्रतिमा की तरह जगमगा रहे हैं। जैसे-यत्न, हिम्मत और सादगी की हवा आसमान में खो गई है-कवि आस्तीक अपनी कविता के समय के आईने में नए बाजार से घिरते जाते संसार का चेहरा दिखाते हुए हमसे कह रहे हैं कि जैसे-दूसरों की कल्पना के बागीचे में उनकी इच्छाओं की दूब उखाड़कर अपनी इच्छाओं के पेड़ लगाए जा रहे हों। कवि आस्तीक दूसरों से कुछ कहना चाहते हैं पर इस समझ के साथ कि ये दूसरे कौन हैं। यह नया कवि हमें एक बार फिर सचेत कर रहा है कि $खुद की पैरवी करते हुए हम थक गए हैं और सब अकेले घूम रहे हैं भाषा की भीड़ में, अर्थ भाग गए हैं, शब्द ही हैं जो नए बन सकते हैं। आस्तीक की कविता में बिना पाए खोने का दुख बार-बार करवट लेता है

  • av Pankaj Mitra
    395,-

    पंकज मित्र हिन्दी के सर्वप्रिय कथाकारों में हैं जिन्हें हमेशा ही पढ़ा जाता है। ग्रामीण और कस्बाई समाज की गहरी पड़ताल और सघन संवेदना तथा थोड़े व्यंग्य के साथ समाज के ठेठ देसी यथार्थ की अक्काशी करनेवाले कथाकार के रूप में उन्होंने अपना एक विशेष स्थान बनाया है। इस संग्रह में शामिल कहानियाँ गाँव-समाज में होनेवाले नित नए बदलावों को रेखांकित करते हुए देश का एक नया कथा-वृत्तान्त रचती हैं जिसमें युवा पीढ़ी, उसकी उम्मीदें, निराशाएँ, बदलते जीवन-मूल्य और चाकू के फल की तरह गाँव की हवा में घुसता शहर कई तरह से उजागर हुआ है। ये कहानियाँ बताती हैं कि गाँव या कहें वह भारतीय चेतना जो एक भाव-धारा की तरह गाँव से चलकर कस्बों और फिर शहरों तक में हमारी खास पहचान होती है, भूमंडलीय वास्तविकता के सामने जो रूप धारण करती है, वह एक अलग ही भाव-भूमि है। उसका सम्बन्ध न योरोप-अमेरिका से जुड़ता है और न भारत की अपनी मिट्टी से। यह एक खतरनाक भूगोल है जिसके समतल होने तक शायद हम बहुत कुछ गँवा दें। 'फेसबुक मेन्स पार्लर', 'अधिग्रहण' आदि कहानियाँ इस यथार्थ को बहुत कलात्मकता के साथ रेखांकित करती हैं। देश के इस बदलते सामाजिक-सांस्कृतिक भूगोल में स्त्री फिर एक उम्मीद की तरह दिखती है, वह शायद इसलिए कि उसे अपना रास्ता बनाना है, ऐसा कोई रास्ता उसके पास था नहीं जिसके खो जाने का भय उसे हो। 'जलेबीबाई डॉट कॉम' इस सन्दर्भ में पठनीय है। 'मनेकि लबरा नाई की दास्तान' अपने शिल्प और अपने मंतव्य दोनों में कथाकार की क्षमता को गहराई से रेखांकित करती है।

  • av Geet Chaturvedi
    395,-

    गीत चतुर्वेदी की काव्य-निर्मिति और शिल्प की एक सिफत यह भी है कि वे 'यथार्थ' और 'कल्पित', ठोस और अमूर्त, संगत से विसंगत, रोज़मर्रा से उदात्त की बहुआयामी यात्रा एक ही कविता में उपलब्ध कर लेते हैं। -विष्णु खरे

  • av Ismat Chugtai
    421,-

    शादी इस्मत चुगताई उर्दू की सम्पूर्ण गद्यकार हैं ! उन्होंने न सिर्फ अफ़साने और उपन्यास लिखे, बल्कि अन्य कई विधाओं में भी अपनी कलम के हुनर का लोहा मनवाया ! उनके आत्मकथात्मक लेखन का पैनापन देखते ही बंटा है ! समाज के साथ अपने ऊपर हँसने की खूबी, गहरा व्यग्य और सुथरा हास्यबोध उन्हें अपने दौर के बाकी कथाकारों से विशिष्ट बनाता है ! फिर अपने स्त्री होने का उनका अहसास और सो भी एक ऐसी स्त्री जिसे बनी बनाई लकीरों से अलग हटकर चलने का कुछ चस्का-सा है, उन्हें अपने समय से भी आगे का विजनरी साबित करता है ! आज वे जितनी उर्दू की हैं उतनी ही हिंदी की भी हो चुकी हैं ! उनकी ज्यादातर रचनाएँ हिंदी में उपलब्ध हैं ! हिंदी में उनकी उर्दू रचनाओं का आना हमेशा पाठकों को उत्तेजित करता रहा है ! ख़ास तौर से उनकी कहानियां जो आज भी लोकप्रियता के उसी शिखर पर हैं, जैसी वे उनके जमाने में थीं ! इस किताब में उनकी कुछ चर्चित कहानियों के अलावा उनके कुछ छोटे ड्रामों को भी शामिल किया गया उनका एक लेख भी इसमें रखा गया है जो उनके उत्कृष्ट संस्मरणात्मक गद्य का नमूना है !

  • av Krishna Sobti
    222 - 434

  • av Monika Singh
    395,-

  • av Vratya Basu
    395,-

  • av Jagran Film Festival
    395,-

    यह किताब एक सुहाना सफ़र है जिससे गुजरते हुए हम पर्दे के दूसरी तरफ की दुनिया से रूबरू होते हैं वो दुनिया सिनेमा की दुनिया है, जादू-भरी दुनिया है जहाँ लेखक एवं फिल्म-समीक्षक अजय ब्रह्मात्मज और मयंक शेखर फिल्म-जगत के दिग्गज और अपनी विधा के माहिर फिल्म निर्देशकों से बातचीत करते हुए हमें अपने साथ लेकर चलते हैं घर की गलियों से शुरू हुई बातें फिल्म इंडस्ट्री की टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियों और उतार-चढाव के तमाम किस्सों को हमारे सामने लेकर आती हैं यह किताब फिल्म बनाने की तकनीक, उसकी बारीकियों और परेशानियों को मजेदार किस्सों में पिरोकर पाठकों के सामने लाती है, और हम जान पाते हैं कि फिल्म बनाने का आइडिया कैसे आता है, कैसे वह कहानी में बदलता है, फिर उसका स्क्रिप्ट में बदलना और आखिरकार फिल्म का तैयार होना यह किताब इसलिए भी महत्त्पूर्ण है कि यह आज के दौर में सिनेमा बनाने की चुनौतियों और फ़िल्मी दुनिया के बड़े एक्सपोजर को सही तरह से आत्मसात कर पाने की क्षमता का भी बखूबी बखान करती है दरअसल, इस बातचीत को संभव बनानेवाला 'जागरण फिल्म फेस्टिवल' भौगोलिक दृष्टि से भारत का सबसे बड़ा फेस्टिवल है जो देश के 16 शहरों में आयोजित किया जाता है यहाँ देश-विदेश के सिनेमा, डॉक्यूमेंट्री और एड फ़िल्में खुद चलकर दर्शकों के सामने आती हैं यह किताब सिनेमा को देखने-परखने की ही नहीं, बल्कि उसे जीने की भी कला सिखाती है

  • av Phanishwarnath Renu
    395,-

    कितने चौराहे' फणीश्वरनाथ रेणु का पठनीय लघु उपन्यास है । पहली बार यह 1966 में प्रकाशित हुआ । इस उपन्यास के वृत्तान्त में लेखक ने निजी जीवन की कई घटनाओं को संयोजित किया है ।. 'कितने चौराहे' की रचना का उद्]देश्य स्पष्ट है । यह उपन्यास आजादी के लिए संघर्ष करने और बलिदान देनेवाले युवकों को केन्द्र में रखकर लिखा गया है, ताकि आज के किशोरों में देशप्रेम, सेवा, त्याग आदि आदर्शों के भाव जाग्रत् हो सकें । यह उपन्यास व्यक्तिगत सुख-दुख, स्वार्थ-मोह से ऊपर उठकर देश के लिए जीने-मरने वालों कै मानवीय, संवेदनशील रूप को उभारता है । पाठकों के मन में यह वृत्तान्त श्रद्धा जाग्रत् करता है । पाठक के मन में चारों ओर चीखते भ्रष्टाचार, स्वार्थपरता आदि के प्रति क्षोभ उभरता है । उत्सर्गी परम्परा के प्रति आकर्षण बढ़ता है । 'कितने चौराहे' में 'आंचलिकता का विश्वसनीय पुट, ज्वलन्त चरित्र सृष्टि, मार्मिक कथावस्तु और चरित्रानुकूल भाषा मोहित करती है । साधारण में निहित असाधारणता का उन्मेष सर्वोपरि है । रेणु के उपन्यास-शिल्प की अनेक विशेषताएँ इस रचना में दृष्टिगोचर होती हैं । शब्दों के बीच से बिम्ब झाँकते हैं, 'सूरज पच्छिम की ओर झुक गया । बालूचर पर लाली उतर.आई । परमान की धारा पर डूबते हुए सूरज की अन्तिम किरण झिलमिलाई ।' जीवन का जयगान करता उपन्यास ।

  • av Suryaprakash Chaturvedi
    395,-

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